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ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका

स्वामी दयानन्द सरस्वती

Book Pages : 385
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ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका

स्वामी दयानन्द सरस्वती

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  • Book Description

    महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा लिखित 'ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका' वेदार्थ-बोध के लिए एक अनुपम ग्रन्थ है। महर्षि ने अपने वेद-भाष्य को ठीक-ठीक समझने और समझाने के लिए ही इसकी रचना की । वेदार्थ के पाठक इसके विना महर्षि के वेद-भाष्य को समझ नहीं सकते । स्वयं महर्षि भूमिका का प्रयोजन बताते हुए वेद-भाष्य के विज्ञापन में लिखते हैं 
    (१) 'जब भूमिका छप के सज्जनों के दृष्टिगोचर होगी, तब वेद-शास्त्र का महत्त्व जो बड़प्पन तथा सत्यपना भी सब मनुष्यों को यथावत् विदित हो जाएगा।' -(पत्र और विज्ञापन, पृ० ३९) (२) 'जो कोई भूमिका के विना केवल वेद ही लिया चाहे, सो नहीं मिल सकते।' 
    -(पत्र और विज्ञापन, पृ० १३८) (३) और यह भी जानना चाहिए कि चारों वेद की भूमिका एक ही है।' 
    –(पत्र और विज्ञापन, पृ० ८७) (४) 'भूमिका चारों वेदों की एक ही है।' 
    –(पत्र और विज्ञापन, पृ० ८६) उपर्युक्त उद्धरणों से जहाँ भूमिका का प्रयोजन स्पष्ट होता है, वहाँ इस भ्रम का भी स्वामी जी के लेख से ही निराकरण हो जाता है कि यह भूमिका वेदादि सब शास्त्रों की है, किन्तु चारों वेदों के भाष्य की है।

  • Book Details

    Title : ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका


    Sub Title : N/A


    Series Title : N/A


    Language : Hindi


    Category : Book


    Subject : वेद भाष्य की भूमिका


    Author 1 : स्वामी दयानन्द सरस्वती


    Author 2 : N/A


    Translator : N/A


    Editor : N/A


    Commentator : N/A


    Publisher : Arsh Sahitya Prachar Trust


    Edition : 10th


    Publish Year : 2007


    Publish City : Delhi


    ISBN # : N/A


    https://vediclibrary.in/book/14/rigvedadi_bhashya_bhumika

  • Book Index

     अध्याय 1 – इसमें ईश्वर की प्रार्थना विषय का वर्णन है।
     अध्याय 2 – इसमें वेदोत्पत्ति के विषय में प्रकाश डाला है।
     अध्याय 3 – इस अध्याय में सिद्ध किया है कि वेद नित्य है।
     अध्याय 4 – इस अध्याय में वेदविषयों पर विचार प्रकट किया है। वेदों से एकेश्वरवाद को प्रस्तुत किया है। विज्ञानकाण्ड और कर्मकाण्ड विषय को समझाया है। देवता शब्द की मीमांसा और देव संख्या का निर्णय किया है। मोक्षमूलर के मत का खण्डन किया गया है।
     अध्याय 5 – इस अध्याय में वेद संज्ञा पर विचार किया है।
     अध्याय 6 – इस में वेदों में वर्णित ब्रह्म विद्या का उल्लेख किया है।
     अध्याय 7 – इस अध्याय में वेदोक्त धर्म का विवेचन किया है।
     अध्याय 8 – इसमें सृष्टि उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय पर प्रकाश डाला है। इस अध्याय में पुरूष सूक्त की व्याख्या की गई है।
     अध्याय 9 – इस अध्याय में पृथिव्यादिलोकभ्रमण विषय पर प्रकाश डाला है।
     अध्याय 10 – इस अध्याय में ग्रहादि के मध्य आकर्षण-अनुकर्षण को वेद प्रमाणों से प्रस्तुत किया है।
     अध्याय 11 – इस अध्याय में प्रकाशक और अप्रकाशक लोकों का वर्णन किया है।
     अध्याय 12 – इस अध्याय द्वारा बताया है कि वेदों में गणित विद्या का मूल है।
     अध्याय 13 – इस अध्याय में ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना और समर्पण विषय का वर्णन है।
     अध्याय 14 – इस अध्याय में उपासना विधि पर प्रकाश डाला है।
     अध्याय 15 – इस अध्याय में मुक्ति और मुक्ति से पुनरावर्ति का विवेचन किया है।
     अध्याय 16 – इस अध्याय में वेदों से नौकायन, विमान विद्या का मूल दर्शाया है।
     अध्याय 17 – इस अध्याय में तार और संचार विद्या का मूल वेदों से दर्शाया है।
     अध्याय 18 – इस अध्याय में वेदों से आयुर्वेदादि चिकित्सा विज्ञान का मूल दर्शाया है।
     अध्याय 19 – इस अध्याय में पुनर्जन्म का वेदों और दर्शनों के प्रमाण से स्पष्टीकरण किया गया है।
     अध्याय 20 – इस अध्याय में विवाह विषय को लिखा गया है।
     अध्याय 21 – इस अध्याय में नियोगादि विषय को लिखा है।
     अध्याय 22 – इस अध्याय में राजा और प्रजा के कर्तव्यों का उल्लेख किया है।
     अध्याय 23 – इस अध्याय में वर्णाश्रम धर्म का वर्णन है।
     अध्याय 24 – इस अध्याय में पाँच महायज्ञों जैसे – अग्निहोत्र, पितृयज्ञ, बलिवैश्वदेवयज्ञ और अतिथियज्ञ का वर्णन है।
     अध्याय 25 – इस अध्याय में आर्ष अनार्ष ग्रन्थों का वर्णन, वैदिक आख्यानों का शुद्धार्थ पर प्रकाश डाला है।
     अध्याय 26 – इस अध्याय में वेदों के अधिकारी एवं अनाधिकारी का उल्लेख किया है।
     अध्याय 27 – इसमें पठन-पाठन विधि का वर्णन है।
     अध्याय 28 – इस अध्याय में वेदों के भाष्य करने की विधि, शङ्काओं का समाधान आदि का निरूपण है तथा सायण और महीधर के भाष्यों का खण्डन किया है।
     अध्याय 29 – इस अध्याय में वेदभाष्य करने की शैली और विषयों के सम्बन्ध में की हुई प्रतिज्ञा का वर्णन है।
     अध्याय 30 – इस अध्याय में वेदार्थ सम्बन्धित विविध प्रश्नोत्तर का निरूपण है।
     अध्याय 31 – इस अध्याय में वैदिक-प्रयोग का नियम प्रस्तुत किया है।
     अध्याय 32 – इस अध्याय में वेदों में प्रयुक्त उदात्त, अनुदात्त और स्वरित तथा षडाजादि सप्त स्वरों का निरूपण किया है।
     अध्याय 33 – इस अध्याय में व्याकरण नियमों का वर्णन है।
     अध्याय 34 – इस अध्याय में वेदों में प्रयुक्त रूपकादि अलङ्कारों का वर्णन किया है।
     अध्याय 35 – इस अध्याय में वेद भाष्यों में प्रयुक्त ग्रन्थों के संकेतों का स्पष्टीकरण किया है।